पुलिस शिकायत प्राधिकरण का बड़ा फैसला: नशेड़ी सहायक उप-निरीक्षक के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश, विभाग पर मिलीभगत का गंभीर आरोप
Major Verdict in 'Addict ASI' Case
विशेष संवाददाता चंडीगढ़, 13 मई: Major Verdict in 'Addict ASI' Case: पुलिस शिकायत प्राधिकरण, केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ ने एक महत्वपूर्ण और सख्त निर्णय लेते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और थाना प्रभारी थाना सेक्टर-3 को आदेश दिया है कि चंडीगढ़ पुलिस के सुरक्षा प्रकोष्ठ में तैनात सहायक उप-निरीक्षक दलजीत सिंह के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 125 और 281 के तहत तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाए। प्राधिकरण ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारी को बचाने के लिए पूरे पुलिस प्रशासन ने भूमिका निभाई।
यह आदेश न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया, जिसमें सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अमरजोत सिंह गिल और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी धीरा खंडेलवाल सदस्य के रूप में शामिल थे। यह मामला शिकायत संख्या 65/2025 के तहत लिया गया था, जिसे 9 दिसंबर 2025 को एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान में लिया गया था।
प्राधिकरण ने निर्देश दिया कि मामले की जांच सहायक उप-निरीक्षक से वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जाए और अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि इस मामले को पहले से लंबित मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 से जुड़े प्रकरण के साथ जोड़कर एक साथ सुना जाए।
यह घटना 3 दिसंबर 2025 की है, जब सुखना झील के पीछे कैंबवाला रोड पर एक बेकाबू सफेद मारुति ब्रेजा ने पहले एक मोटरसाइकिल को टक्कर मारी और बाद में एक स्कूली बस से भी टकरा गई। घटना में मोटरसाइकिल सवार वीरेंद्र कुमार घायल हो गया था और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालांकि बस में उस समय कोई बच्चा मौजूद नहीं था, जिससे बड़ी दुर्घटना टल गई।
मौके पर पहुंची पुलिस ने पाया कि वाहन चला रहा व्यक्ति नशे की हालत में था और वह चंडीगढ़ पुलिस का ही सहायक उप-निरीक्षक दलजीत सिंह था। आरोप है कि वह ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के बाद नशे की हालत में लौटा था और इसके बावजूद उसे वाहन लेकर जाने दिया गया, जिसके बाद यह हादसा हुआ।
पुलिस ने प्रारंभ में केवल मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 के तहत चालान किया, लेकिन भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज नहीं की गई। बाद में यह भी सामने आया कि कई महत्वपूर्ण गवाहों के बयान समय पर दर्ज नहीं किए गए और वरिष्ठ स्तर से अनुमति का हवाला देकर कार्रवाई को लंबित रखा गया।
प्राधिकरण की जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने स्पष्ट रूप से बताया कि अधिकारी नशे की हालत में था। इसके अलावा स्कूली बस चालक ने भी बाद में बयान दिया कि उसकी बस को पुलिस वाहन ने टक्कर मारी थी।
सुनवाई के दौरान आरोपी सहायक उप-निरीक्षक ने अपने वकील के माध्यम से कहा कि उनके खिलाफ पहले ही चालान हो चुका है और वह निलंबन झेल चुके हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि वे नशे में वाहन नहीं चला रहे थे, लेकिन प्राधिकरण ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
अंत में प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक लापरवाही का संकेत है और इसमें एफआईआर दर्ज करना आवश्यक था। प्राधिकरण ने यह भी कहा कि कानून के अनुसार संज्ञेय अपराध में अनुमति की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए कार्रवाई में देरी अनुचित थी।
यह फैसला न केवल इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया को गति देगा, बल्कि पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।